
शलभ गौरानी कीरिपोर्ट।
कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी में उलझी संगठनात्मक नियुक्तियांदबाव और खींचतान के चलते सतवास–कांटाफोड़ ब्लॉक अध्यक्ष की घोषणा अटकीकांटाफोड़।कांग्रेस संगठन में लंबे समय से चली आ रही अंदरूनी गुटबाजी एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। देवास जिला कांग्रेस अध्यक्ष मनीष चौधरी इस समय पार्टी के भीतर विभिन्न गुटों के दबाव और आपसी खींचतान के बीच फंसे नजर आ रहे हैं।

इसी कारण सतवास एवं कांटाफोड़ ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति पर फिलहाल निर्णय नहीं हो सका है।सूत्रों के अनुसार, दोनों ब्लॉकों में अध्यक्ष पद के लिए कई दावेदार सक्रिय हैं। अलग-अलग गुट अपने-अपने समर्थकों को पद दिलाने के लिए जिला नेतृत्व पर दबाव बना रहे हैं। एक गुट संगठनात्मक अनुभव और सक्रियता को प्राथमिकता देने की बात कर रहा है, जबकि दूसरा गुट वरिष्ठ नेताओं की सिफारिशों को आधार मान रहा है।

इस आपसी खींचतान के चलते अब तक किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पाई है।कभी एक नाम से चलता था जिला, आज निर्णय पर असमंजसदेवास जिले की राजनीति में एक समय ऐसा भी रहा है जब संगठनात्मक फैसले बिना किसी विवाद के तय हो जाते थे। उस दौर में श्याम होलानी का नाम जिले की राजनीति, प्रशासन और सामाजिक जीवन में प्रभावशाली नेतृत्व का प्रतीक माना जाता था। उनके निर्णयों को मजबूती के साथ स्वीकार किया जाता था और संगठन एक दिशा में आगे बढ़ता था।आज स्थिति इसके विपरीत दिखाई दे रही है। कांग्रेस संगठन में गुटबाजी हावी है और ब्लॉक अध्यक्ष पद की दौड़ में कमल सिसोडिया, गुरमीत भाटिया, राजाराम यादव, विष्णु मीणा सहित कई नाम सामने हैं। इससे संगठन में असमंजस और अस्थिरता की स्थिति बनती जा रही है।

बागली विधानसभा क्षेत्र में गुटबाजी खुलकर नजर आती हैराजनीतिक जानकारों के अनुसार, बागली विधानसभा क्षेत्र प्रदेश का एकमात्र ऐसा क्षेत्र माना जाता है, जहां कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की गुटबाजी सबसे अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यहां पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव—तीनों के अलग-अलग समर्थक सक्रिय हैं। इन खेमों की सक्रियता का असर संगठनात्मक नियुक्तियों और निर्णयों पर समय-समय पर पड़ता रहा है।जिलाध्यक्ष का पक्ष : उपचुनाव के कारण देरीइस पूरे मामले में जब जिला कांग्रेस अध्यक्ष मनीष चौधरी से चर्चा की गई, तो उन्होंने नियुक्ति में देरी का कारण सतवास उपचुनाव को बताया। उनका कहना है कि उपचुनाव की प्रक्रिया के चलते फिलहाल दोनों ब्लॉक अध्यक्षों की घोषणा नहीं की जा सकी है।हालांकि, पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि उपचुनाव के साथ-साथ आपसी खींचतान और गुटीय दबाव भी निर्णय में देरी का बड़ा कारण है।कार्यकर्ताओं में बढ़ती नाराजगीब्लॉक स्तर पर लंबे समय से नेतृत्व तय न होने के कारण कांग्रेस कार्यकर्ताओं में असंतोष और असमंजस की स्थिति बनी हुई है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि स्पष्ट नेतृत्व के अभाव में संगठनात्मक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं और इसका असर आगामी चुनावी तैयारियों पर भी पड़ सकता है।अब कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं की निगाहें प्रदेश नेतृत्व के हस्तक्षेप और अंतिम निर्णय पर टिकी हुई हैं।
